वोटरवाणी खास

Editorial: भारत को नेपाल, बांग्लादेश बना देने का ख़्वाब

Editorial

चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा लेने, उन्हें गिरफ़्तार कर उनपर आपराधिक मुकदमा चलाने को लेकर जो धरना-प्रदर्शन आंदोलन चलाया जा रहा है, उससे भी बड़ा अब यह हो गया है कि पुलिस प्रशासन ने इसे बड़े शांतिपूर्ण तरीक़े से निपटा लिया है!
2 अक्टूबर को दिल्ली-मुंबई से हुई शुरुआत की हवा ही निकालकर रख दी पुलिस ने, अर्थात्


ख़ूब उकसावे के बावजूद भी पुलिस ने धैर्य का परिचय देते हुए पूरे संयम से काम लिया! बिना लाठी के, कोई भी अतिरिक्त शक्ति का उपयोग किए बिना शांतिपूर्वक प्रदर्शन का नियंत्रण किया, जिसकी प्रशंसा की जानी चाहिए! विदित हो कि पेपर लीक को लेकर जंतर-मंतर पर जो हुआ, उसे लेकर जो फ़ज़ीहत हुई थी, उससे काफ़ी कुछ सीखा है प्रशासन ने, जो अब दिखाई दे रहा है!


दूसरी बात यह हुई कि इनकी नौटंकियों को मीडिया में भी ज़्यादा तवज्जो नहीं दी गई, क्योंकि कैप्टन स्मित की रेटिंग बहुत डिमांडिंग बन गई है। ये लोग भले ही डरते हों उसपर कुछ बोलने से, लेकिन पूरा विश्व बोल रहा है! हर कोई स्मित की पल-पल की जानकारी और उसका हर शब्द सुनना चाहता है!


SIR पर देश को हर बारीक जानकारी मीडिया लगातार दे रहा है, ऊपर से चुनाव आयुक्त को लेकर भी पूरा सच जनता तक पहुँच रहा है।
जितना मूर्ख ये समझ रहे हैं, यह इनका भ्रम मात्र है; इनकी नौटंकियों को जनता खूब समझ रही है।
ऐसे तरीकों से इनके वोट तो बढ़ने से रहे, बल्कि कम कितने हो जाएँगे, यह आने वाला समय ही बताएगा!


देश का कोई भी नागरिक कभी यह नहीं चाहेगा कि भारत का हाल नेपाल या बांग्लादेश जैसा हो।
देश समझ रहा है कि इनके प्रोपेगैंडा के पीछे क्या इरादे हैं, देश के मायने इनके लिए क्या हैं, यह अब देश को समझ आ गया है!
ओमान के को-पायलट हमाम अल हमामी का अलकायदा से संबंध भी सामने आ गया है!


विदित हो कि ‘ऐसे हमले और होने चाहिए’ कहा है अलकायदा ने, फिर भी हमारे विपक्ष के इस मामले में होंठ सिले हुए हैं। उन्हें लगता है कि कुछ कहने से उनके वोट न खराब हो जाएँ।
उन्हें इसकी कतई भी परवाह नहीं कि स्मित पर न बोलने का देश की जनता पर क्या प्रभाव होगा! इन सबमें से सुलझे हुए पॉलिटिशियन का प्रमाण तो ओवैसी ने दिया है कैप्टन स्मित की प्रशंसा कर!

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बहरहाल धरना-प्रदर्शन आंदोलन जारी है और फिर एक बार जंतर-मंतर पर रौनक लग सकती है, लेकिन जिस प्रकार से उनकी बदतमीज़ियाँ दिनों-दिन बढ़ती जा रही हैं, वह चुभने लगी हैं। क्या माननीय अदालतें इस ओर से अपने कान-आँख बंद रखती हैं, यह समझ से परे है!!
ज़रा सोचिए ………

Anjali Satya Sharma

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