चुनाव आयोग के भीतर फैसलों को लेकर सामने आए मतभेदों के बाद सियासी विवाद तेज हो गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए आरोप लगाया कि चुनावी व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर भी देश के लोकतांत्रिक ढांचे को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया। ये राहुल गांधी के आरोप हैं; संबंधित रिपोर्ट अपने स्तर पर इन आरोपों को सिद्ध नहीं करती।
दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीने में 14 बार जताई आपत्ति
विवाद की वजह The Indian Express की खोजी रिपोर्ट है। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति दर्ज की। ये आपत्तियां SIR के दौरान मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने, Form-6 में बदलाव, वोटर डेटाबेस के कथित केंद्रीकरण और कुछ फैसले उनकी जानकारी के बिना लिए जाने जैसे मुद्दों से जुड़ी थीं। अखबार ने बताया कि उसने इन मुद्दों पर चुनाव आयोग और दोनों आयुक्तों से प्रतिक्रिया मांगी थी, लेकिन रिपोर्ट प्रकाशित होने तक जवाब नहीं मिला था।
क्या CEC अकेले ले सकते हैं अंतिम फैसला?
कानूनी व्यवस्था के मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त को हर मामले में अकेले अंतिम फैसला लेने का अधिकार नहीं है। चुनाव आयोग में CEC और दोनों Election Commissioners फैसले की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। 2023 के कानून की धारा 18 के अनुसार आयोग का काम जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से होना चाहिए और मतभेद होने पर फैसला बहुमत की राय से किया जाता है। ऐसे में सामने आई आंतरिक आपत्तियों ने SIR की प्रक्रिया और आयोग के भीतर निर्णय लेने के तरीके पर नई बहस छेड़ दी है।


