Akashvani Bhavan परिसर में 6 अक्टूबर को प्रदर्शन के मामले में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और अन्य लोगों के खिलाफ FIR दर्ज होने के बाद यह सवाल चर्चा में है कि क्या किसी सरकारी संस्थान में बिना अनुमति प्रवेश करना अपने-आप अपराध है? कानून की नजर में मामला इतना सीधा नहीं है।

भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 329 के मुताबिक, किसी दूसरे के कब्जे वाली संपत्ति में प्रवेश या वहां अवैध रूप से बने रहना तभी ‘क्रिमिनल ट्रेसपास’ बनता है, जब इसके साथ अपराध करने, किसी को डराने, अपमानित करने या परेशान करने जैसी आपराधिक मंशा जुड़ी हो। यानी सिर्फ अनुमति के बिना प्रवेश को हर परिस्थिति में धारा 329 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।
Akashvani Bhavan FIR में आरोप क्या हैं और सजा कितनी हो सकती है?
सामने आई जानकारी के मुताबिक, Akashvani Bhavan प्रशासन की शिकायत में आरोप है कि प्रदर्शनकारी बिना अनुमति परिसर में दाखिल हुए और वहां धरने पर बैठे। हालांकि FIR में कौन-कौन सी धाराएं लगाई गई हैं, इसकी पूरी सूची स्पष्ट हुए बिना यह कहना सही नहीं होगा कि धारा 329 निश्चित रूप से लगाई गई है।

BNS की धारा 329(3) के तहत आपराधिक अतिचार साबित होने पर तीन महीने तक की जेल, 5,000 रुपये तक जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। वहीं ‘हाउस ट्रेसपास’ की स्थिति में सजा एक साल तक हो सकती है। मामले के तथ्यों के आधार पर सरकारी कर्मचारी के काम में बाधा या किसी वैध आदेश की अवहेलना से जुड़ी अन्य धाराओं पर भी विचार हो सकता है।
प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन उसकी भी सीमा है
संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार देता है, लेकिन ये अधिकार उचित प्रतिबंधों के अधीन हैं। सुप्रीम कोर्ट ने Amit Sahni v. Commissioner of Police मामले में सार्वजनिक रास्तों पर लंबे समय तक प्रदर्शन से आम लोगों की आवाजाही प्रभावित होने के सवाल पर स्पष्ट किया था कि विरोध के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन जरूरी है। इसलिए Akashvani Bhavan मामले में भी अंतिम कानूनी स्थिति आरोपों, FIR की धाराओं, उपलब्ध साक्ष्यों और जांच के नतीजे पर निर्भर करेगी। FIR दर्ज होना आरोप की शुरुआत है, दोष साबित होना नहीं।



