भारत दुनिया के सबसे बड़े Gold Consumers में शामिल है और देश में सोने की रिफाइनिंग क्षमता भी तेजी से बढ़ी है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की Bullion Export हिस्सेदारी बेहद सीमित है। 2025 में भारत की सोने की मांग करीब 711 टन रहने का अनुमान है। ऐसे में सवाल उठता है कि इतनी बड़ी घरेलू मांग और मजबूत रिफाइनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के बावजूद भारत सोने के बड़े निर्यातक देशों में क्यों नहीं गिना जाता?
समस्या रिफाइनिंग की नहीं, Gold Export Ecosystem की है
IIM अहमदाबाद के भव्य गुप्ता और सुंदरवल्ली नारायणस्वामी के एक वर्किंग पेपर में इसी विरोधाभास का अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत की चुनौती केवल सोने को रिफाइन करने की क्षमता से जुड़ी नहीं है। घरेलू बाजार में सोने की भारी मांग, आयात पर निर्भरता और पूरी वैल्यू चेन की संरचना भी यह तय करती है कि रिफाइन किया गया सोना घरेलू खपत में जाएगा या विदेशी बाजार तक पहुंचेगा।

भारत का Gold Market क्यों है अलग?
भारत में सोना सिर्फ निवेश या आभूषण का कारोबार नहीं, बल्कि घरेलू बचत और ज्वेलरी इंडस्ट्री का भी अहम हिस्सा है। देश में आने वाले सोने का बड़ा हिस्सा घरेलू मांग पूरी करने में खप जाता है। ऐसे में रिफाइनिंग क्षमता बढ़ने के बावजूद निर्यात के लिए उपलब्ध अतिरिक्त बुलियन सीमित रह सकता है। यही वजह है कि भारत का Gold Market एक दिलचस्प स्थिति दिखाता है—देश सोने का बड़ा खरीदार और रिफाइनिंग हब है, लेकिन Bullion Export में अभी भी उसकी मौजूदगी छोटी है।


