Supreme Court ने एक अहम फैसले में कहा है कि रिश्ता टूटने के बाद आपसी सहमति से बने पुराने शारीरिक संबंधों को सिर्फ पछतावे के आधार पर दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि दो वयस्कों के बीच सहमति से बने संबंध बाद में रिश्ता खराब होने या खत्म होने के कारण अपराध नहीं बन जाते।

Supreme Court ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को इस डर से रिश्ता जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता कि अलग होने पर उसके खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज हो जाएगा।
धोखे से सहमति और बाद के पछतावे में अंतर जरूरी
Supreme Court ने कहा कि शुरुआत से ही झूठ या धोखे के जरिए शारीरिक संबंध बनाने के लिए सहमति हासिल करना और रिश्ता टूटने के बाद पुराने संबंधों पर पछतावा होना, दोनों अलग स्थितियां हैं। अदालत ने साफ किया कि शादी का झूठा भरोसा देकर शुरू से धोखे से संबंध बनाने के मामलों में कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

पीठ ने असफल रिश्तों को आपराधिक मामलों में बदलने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए कहा कि दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध का आरोप वास्तविक यौन हिंसा, जबरदस्ती, दबाव या धोखे से सहमति लेने के मामलों तक सीमित रहना चाहिए।
पहली शादी छिपाने के आरोप में आरोपी को राहत
यह मामला केरल के संतोष कुमार एनपी से जुड़ा था। महिला ने आरोप लगाया था कि संतोष ने अपनी पहली शादी छिपाकर उससे विवाह किया और उसे कानूनी रूप से वैध शादी का भरोसा दिया। दोनों 1996 से 2003 तक साथ रहे।

Supreme Court ने आरोपी की अपील स्वीकार करते हुए उसे दुष्कर्म और धोखाधड़ी के आरोपों से मुक्त कर दिया। अदालत ने कहा कि वयस्कों को अपनी पसंद से रिश्ता बनाने और खत्म करने की आजादी है। निजी रिश्तों के विवादों में आपराधिक कानून का इस्तेमाल बदला लेने या किसी को मजबूर करने के लिए नहीं होना चाहिए।


