सवाल यह है कि राजनीति का यह कौन सा पाठ है जिसे देश की संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा नहीं है? कल शिक्षा मंत्री निशाने पर थे तो अब
चुनाव आयुक्त, हालाँकि इस बीच में देश के गृहमंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री श्री Narendra Modi जी के इस्तीफ़े की बात भी की गई!
मतलब यह है कि देश की बागडोर इनके सुपुर्द कर दो, बाक़ी सब इस्तीफ़ा दे दो! अब जब देश के चुनाव आयुक्त के इस्तीफ़े तक ये पहुँच गए हैं, तब कल माननीय चीफ़ जस्टिस का भी इस्तीफ़ा माँग सकते हैं, इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए; क्योंकि जंतर-मंतर आंदोलन में वे स्पष्ट बता तो चुके हैं कि पार्लियामेंट उखाड़ देंगे, नेपाल बना देंगे आदि-आदि, और क्या कहें!

मतलब साफ़ है कि इन्हें देश की किसी भी संवैधानिक संस्था पर भरोसा नहीं है; उनके अनुसार वे नहीं चल रही हैं, इसीलिए इस पूरी व्यवस्था को बदलना है इन्हें!
देश के क़ानून से भी इनका भरोसा टूट चुका है।
अदालतों में न जाकर ये सीधे इस्तीफ़े पर आ गए हैं! केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा ले लेने के बाद इनके हौसले और इरादे बुलंद हो चुके हैं।
इस मामले में अब सब एक हो गए हैं, सभी दलों के कार्यकर्ताओं को नई ज़िम्मेदारी मिल गई है।
भारत को बांग्लादेश-नेपाल बनाने के लिए सब सड़कों पर उतर गए हैं। चुनाव से जीत पाने की उम्मीद नहीं रही, देर हुई तो फिर बहुत देर हो जाएगी; जनता समझ ही नहीं रही, ये इतना कुछ कर रहे हैं लेकिन जनता सड़कों पर नहीं आ रही है, अतः जनता के हित में इन सारे दलों को सड़कों पर उतरना पड़ा है!

इनके साथ देश के नामी-गिरामी वकीलों की जमात भी है जिसकी वजह से प्रशासन फूँक-फूँककर कदम उठा रहा है क्योंकि कल को अदालतों को भी जवाब देना होगा; जंतर-मंतर का चैप्टर अभी बंद नहीं हुआ है।
ऐसे में आम आदमी डरा हुआ है कि न जाने देश को ये किस दिशा में ले जाएँ? चुनौतियाँ बहुत बड़ी हैं और हर बार नए तरीक़े से सामने आती हैं, लेकिन देश की जनता को भरोसा है कि मोदी इस चुनौती से भी कुशलता से निपट लेंगे और देश को कोई नुक़सान नहीं होने देंगे।
ज़रा सोचिए……..


