वैवाहिक विवाद और बच्चे की कस्टडी से जुड़े POCSO मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस और अदालतों के लिए अहम सुरक्षा उपाय तय किए हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में सिर्फ FIR दर्ज होने के आधार पर जल्दबाजी में गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए। जांच अधिकारियों को BNSS की धारा 35 के तहत गिरफ्तारी से जुड़े नियमों का पालन करना होगा और कार्रवाई से पहले मामले की परिस्थितियों को समझना होगा। हालांकि, इन निर्देशों का मकसद POCSO कानून को कमजोर करना नहीं, बल्कि बच्चे की सुरक्षा के साथ कानूनी प्रक्रिया में संतुलन बनाए रखना है।
जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ करेंगे बच्चे का मूल्यांकन
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर जरूरत हो तो बच्चे का बाल एवं किशोर मनोचिकित्सा या क्लिनिकल साइकोलॉजी के विशेषज्ञ से स्वतंत्र मूल्यांकन कराया जा सकता है। बच्चे पर माता-पिता या जांच एजेंसी का दबाव नहीं होना चाहिए और उसे बार-बार पूछताछ से बचाना जरूरी है। विशेषज्ञ की रिपोर्ट जांच में मदद करेगी, लेकिन जांच अधिकारी उसकी राय मानने के लिए बाध्य नहीं होगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन हर मामले में अनिवार्य नहीं है; अगर मामला स्पष्ट हो तो इसके बिना भी जांच आगे बढ़ सकती है, लेकिन इसका कारण रिकॉर्ड करना होगा।
बच्चे का हित रहेगा सबसे ऊपर
शीर्ष अदालत ने दोहराया कि ऐसे मामलों में बच्चे का कल्याण, भावनात्मक सुरक्षा, गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य सर्वोच्च प्राथमिकता रहनी चाहिए। साथ ही POCSO के तहत लगाए गए आरोपों की जांच कानून के अनुसार पूरी गंभीरता से की जाएगी। कोर्ट के निर्देशों का उद्देश्य कस्टडी विवादों में सामने आने वाले संवेदनशील मामलों की जांच को अधिक सावधानीपूर्ण और बच्चा-केंद्रित बनाना है।


