देश की राजधानी दिल्ली में हुए इस साल विधानसभा चुनाव में बीजेपी 27 सालों बाद पूर्ण बहुमत यानि कि 48 सीटों के साथ सत्ता में जगह बना पाई, तो वहीं आम आदमी पार्टी को 10 साल शासन करने के बाद 22 सीटों के साथ करारी हार का सामना करना पड़ा और रही बात कांग्रेस की तो उसका तो खाता ही नहीं खुला।
आपदा की मुफ्त रेवड़ी ही नहीं, विकास भी जरूरी: बीजेपी
आम आदमी पार्टी की हार के रूप में दिल्ली की जनता का ये फैसला आप के मुखिया अरविंद केजरीवाल के लिए ही नहीं बल्कि पूरी आम आदमी पार्टी के लिए एक बहुत बड़ा झटका है। 10 सालों बाद दिल्ली की जनता को बीजेपी ये एहसास करवा पाई कि सिर्फ आपदा की मुफ्त की रेवड़ी से ही कुछ नहीं होगा, राजधानी में विकास भी एक बहुत बड़ा मुद्दा उभर कर सामने आया। कई इलाकों में गंदगी, टूटी-फूटी सड़कें और भ्रष्टाचार जैसे तमाम आरोप लगातार विपक्ष की और से लगाए जा रहे थे।
आप के कई बड़े नेताओं का जेल आगमन
सबसे बड़ा मुद्दा तो रहा अरविंद केजरीवाल सहित आप के कई बड़े नेताओं का भ्रष्टाचार मामले में जेल आगमन और इस भ्रष्टाचार के आरोपों में सबसे बड़ा आरोप था शराब घोटाला और उससे भी बड़ा मुद्दा बना शीश महल, जिसने पूरे देश में दिल्ली की सियासत को लेकर भोकाल मचा दिया था।
सियासी गूंज के मुताबिक केजरीवाल की नज़र पंजाब की मुख्यमंत्री सीट पर
बीजेपी के मुताबिक दिल्ली का ये चुनावी परिणाम का असर पंजाब में भी देखने को मिलेगा, क्योंकि वहां भी आप की ही सरकार है जिसके मुख्यमंत्री भगवंत मान सिंह हैं। वैसे तो राजनीति में चुनावी हार-जीत चलती ही रहती है लेकिन सत्ता का लालच भी अपने ही पार्टी के नेता के साथ राजनीतिक गेम खेलने पर मजबूर कर सकता है। सियासी गूंज के मुताबिक अरविंद केजरीवाल वर्तमान मुख्यमंत्री मान को हटाकर पंजाब के मुख्यमंत्री पद पर आसीन होना चाहते हैं। इस बात को भगवंत मान के साथ ही आम आदमी पार्टी के कई बड़े नेताओं ने सिरे से खारिज कर दिया है।
क्या भविष्य में दिल्ली की जनता का विश्वास जीत पाएगी आप
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि AAP इस हार से कैसे उबरेगी? पार्टी को अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा और जनता के विश्वास को दोबारा जीतने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर AAP अपने मूल मुद्दों—शिक्षा, स्वास्थ्य और जनहित योजनाओं पर फिर से फोकस करे और भ्रष्टाचार के आरोपों से खुद को मुक्त साबित करे, तो वह भविष्य में वापसी कर सकती है।
AAP के लिए यह हार एक बड़ा झटका जरूर है, लेकिन राजनीति में वापसी की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। अब यह देखना होगा कि अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम आने वाले समय में किस तरह से पार्टी को दोबारा मजबूत करने की कोशिश करते हैं।


