25-26 फरवरी को पेश होने वाले बजट को लेकर चर्चाएं तेज हैं। जहां आर्थिक विशेषज्ञ इसकी सराहना और आलोचना कर रहे हैं, वहीं राजनीतिक दलों के बीच पारंपरिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी जारी है। इस बार के बजट को “मिडिल क्लास के लिए ऐतिहासिक” बताया जा रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सच में यह मध्यम वर्ग के लिए कोई राहत लेकर आया है, या फिर यह सिर्फ आंकड़ों का खेल है?
मध्यम वर्ग की स्थिति ऐसी है कि न तो वह गरीबों की तरह सरकारी योजनाओं का लाभ ले सकता है, और न ही अमीरों की तरह ऐशो-आराम की जिंदगी जी सकता है। एक ओर उसे बच्चों की पढ़ाई, ट्यूशन, यूनिफॉर्म, दूध, राशन और स्वास्थ्य का ध्यान रखना पड़ता है, तो दूसरी ओर किराया, गाड़ी, पेट्रोल, मोबाइल, बिजली-पानी और घरेलू खर्च की भी चिंता सताती है।
अगर मियां-बीवी दोनों कमाते भी हैं, तो हर महीने इतनी ही बचत हो पाती है कि किसी इमरजेंसी में अस्पताल, थाना-कचहरी के चक्कर लगें, तो घर का बजट पूरी तरह बिगड़ जाए।
सरकार ने 12 लाख तक की आय पर टैक्स में राहत देने की घोषणा की है, लेकिन देश के करोड़ों मध्यमवर्गीय परिवारों की आमदनी अभी उस स्तर तक नहीं पहुंच पाई है। उनके लिए सबसे बड़ा सवाल यही है—“लाख रुपये महीना कमाने की स्थिति में हम कब आएंगे?” बजट में मध्यम वर्ग के लिए बहुत कुछ करने की बात कही जा रही है, लेकिन ज़मीन पर हालात अभी भी संघर्षपूर्ण हैं।
मध्यम वर्ग की स्थिति ऐसी हो गई है कि न तो वह नीचे के आर्थिक वर्ग में शामिल हो सकता है, न ही ऊपर उठने की कोई ठोस राह दिख रही है। खुद का घर बना पाना मुश्किल है, किराया भरना भी आसान नहीं, और झुग्गी में जाकर रहना भी संभव नहीं। ऐसे में वह इसी दायरे में संघर्ष करते हुए अपना जीवन बिता देता है।
✔ टैक्स में छूट का लाभ उन्हीं को मिलेगा, जिनकी आय 12 लाख तक पहुंच चुकी है।
✔ छोटे व्यवसायियों, वेतनभोगी कर्मचारियों और नौकरीपेशा लोगों को राहत कब मिलेगी?
✔ महंगाई, स्वास्थ्य खर्च, शिक्षा खर्च और रोजमर्रा की जरूरतों पर कोई ठोस उपाय नहीं।
✔ मध्यम वर्ग को ऊपर उठाने के लिए अभी और बड़े कदम उठाने की जरूरत है।सरकार कोशिश कर रही है, लेकिन मध्यम वर्ग को असली राहत देने के लिए अब भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। बजट कागजों पर ऐतिहासिक हो सकता है, लेकिन जब तक ज़मीनी हकीकत नहीं बदलेगी, तब तक मध्यम वर्ग के लिए यह एक और परीक्षा ही रहेगा।
