अमेरिका ने हाल ही में अपने देश में रह रहे अवैध प्रवासियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए हैं, जिससे एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अवैध प्रवासन का मुद्दा गर्मा गया है। अमेरिका द्वारा गैरकानूनी तरीके से रह रहे नागरिकों को वापस उनके देश भेजने का निर्णय क्या गलत है? या यह हर देश के लिए एक सबक होना चाहिए?
अमेरिका का यह फैसला उसके संप्रभु अधिकारों के दायरे में आता है। हर देश को अपनी सीमाओं की सुरक्षा करने और गैरकानूनी प्रवासियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का अधिकार है। लेकिन भारत में इन अवैध रूप से रहने वाले नागरिकों को लेकर घड़ियाली आंसू बहाने का सिलसिला जारी है। सवाल उठता है—क्या उनके प्रति सहानुभूति दिखाना सही है, जिन्होंने अपने देश की इज्जत को दांव पर लगाया और गैरकानूनी तरीके से विदेशों में बसने की कोशिश की?
भारत में भी लाखों घुसपैठिए अवैध रूप से रह रहे हैं। जब भी सरकार इनके खिलाफ कार्रवाई करने की कोशिश करती है, तो कुछ राजनीतिक दल इसे मानवाधिकार का मुद्दा बना देते हैं।
✔ विदेशी एजेंटों और दलालों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
✔ अवैध घुसपैठ को रोकने के लिए सख्त कानून बनाए जाने चाहिए।
✔ विदेशों में अवैध रूप से बसने वालों को समर्थन देने वालों की जांच होनी चाहिए।
भारत में कुछ नेताओं ने अमेरिका की इस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं, जबकि यह कोई नई बात नहीं है। दुनियाभर के देश अपने यहां गैरकानूनी रूप से रह रहे लोगों को डिपोर्ट करते हैं। लेकिन यह पहली बार नहीं जब इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है। सवाल यह भी उठता है कि इन प्रवासियों को अवैध तरीके से भेजने वाले एजेंट्स और उनके राजनीतिक संरक्षकों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं होती?
अमेरिका ने तो इन प्रवासियों को बिना सजा दिए ही उनके देश वापस भेज दिया। अन्यथा, वे उन्हें सजा देकर फिर डिपोर्ट कर सकते थे। भारत में भी जब अवैध प्रवासियों को निकालने की बात होती है, तो वही नेता जो अमेरिका पर सवाल उठा रहे हैं, खुद इस मुद्दे पर विरोध करने लगते हैं।
अब वक्त आ गया है कि भारत भी इस मुद्दे पर अमेरिका की तरह सख्त रुख अपनाए। अवैध प्रवास को बढ़ावा देने वाले नेटवर्क और उन्हें राजनीतिक संरक्षण देने वालों की गहन जांच होनी चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाएं न दोहराई जाएं।


